इकिस साल का था जब मेरी प्रभु येशु से मुलाकात हुई। में खुद को भक्त जनोमें सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता और न ही में मेरे परिवार द्वारा सिखाये गए आचार विचार पर चलने वाला इंसान। आप अगर अपने निजी सगे संबंधियों पर गौर करेंगे तो आप भी मेरी इस बात पर सहमत होंगे की कच्चे धागों से बंधे हुए रिश्ते अक्सर हमें कुछ कच्चे पक्के रीति रिवाजों से हमें बाँध रखते है और हमें हमारे इर्द गिर्द के पूरे इलाके एक जैसे लोग दिखने लगते है। हमें अक्सर ये लगने लगता है की हमारे पिता के जो दोस्त है वोह एक विचार धरा से बंधे है। हमें यह भी एहसास होता है की हमारे माताश्री के परिवार और सहेलिया कुछ अलग है पर वोह भी हमारे परिवार और अडोस पड़ोस के विचार धाराओं में ढले हुए है।
कुछ ही दिनों में हम बड़े हो जाते है और शाधि ब्याह रचा कर एहसास कर पते है की हमारा जग एक विचार धाराओं के अंतर का एक माह सागर है जिसमें हम डूबे हुए है। इन विचार धाराओं की उलझन ऐसी की हम जब तक इसमें तैरना सीखते हैं हमे धीरे धीरे ये एहसास होने लगता है की इस वास्तव में हमारे इर्द गिर्द के सरे लोग सामाजिक व्यवस्था के परे एक अपना भी जहाँ इनका खुद का होता है जहाँ ये चैयन की तलाश में भटक रहे होते है। हमें अचानक ये लगने लगता है की हमे अपने ही लोक में चैन की अवक्ष्यता थी तो हम किसलिए सामाजिक व्यवस्था के अनुसार बहने की कोशिश कर रहे थे।
इसलिए ध्यान रखें, बंधी न बने। बंधक न बने दार्शनिक एवं खोखले और विचारधाराओं से जो बंधे हो परंपराओं से और अधपके ऊपरी ज्ञान से। सारी सृस्टि जिसने बनाई, सब कुछ जिसने अपने लिए बनाया हु इसा मसि ही मार्ग है , सत्य है और जीवन है। उसे जाने। बंधे हो तो जाने क्यों। जरूरत नहीं है की सब जिए है जैसे वही सर्वोत्तम हो। परमात्मा ने हमें क्यों बनाय इस बात का अगर हमें ज्ञान मिले तो व्हो हमारे लिए ऐसी बंधन है जो हमें आज़ाद केरे।